ऐसी आरती राम रघुबीर की करहि मन। हरण दुखदुन्द गोविन्द आनन्दघन॥ अचर चर रुप हरि, सर्वगत, सर्वदा, बसत, इति बासना धूप दीजै। दीप निजबोधगत कोह-मद-मोह-तम, प्रौढ़ अभिमान चित्तवृत्ति छीजै॥ ऐसी आरती...॥ भाव अतिशय विशद प्रवर नैवेद्य शुभ, श्रीरमण परम सन्तोषकारी। प्रेम-ताम्बूल गत शूल सन्शय सकल, विपुल भव-बासना-बीजहारी॥ ऐसी आरती...॥ अशुभ-शुभ कर्म घृतपूर्ण दशवर्तिका, त्याग पावक, सतोगुण प्रकासं। भक्ति-वैराग्य-विज्ञान दीपावली, अर्पि नीराजनं जगनिवासं॥ ऐसी आरती...॥ बिमल हृदि-भवन कृत शान्ति-पर्यंक शुभ, शयन विश्राम श्रीरामराया। क्षमा-करुणा प्रमुख तत्र परिचारिका, यत्र हरि तत्र नहिं भेद-माया॥ ऐसी आरती...॥ आरती-निरत सनकादि, श्रुति, शेष, शिव, देवरिषि, अखिलमुनि तत्त्व-दरसी। करै सोइ तरै, परिहरै कामादि मल, वदति इति अमलमति दास तुलसी॥
॥ इति ॥
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