ॐ जय यक्ष कुबेर हरे, स्वामी जय यक्ष कुबेर हरे। शरण पड़े भक्तन के, भण्डार भरे॥ ॐ जय...॥ शिव भक्तों में भक्त कुबेर बड़े हैं। दैत्य दानव मानव से कई युद्ध लड़े हैं॥ ॐ जय...॥ स्वर्ण सिंहासन बैठे, सिर पर छत्र फिरे। नौ निधियों के स्वामी हो, प्रभु सब सिद्धि भरे॥ ॐ जय...॥ भांति-भांति के व्यंजन, भोग लगे तेरे। दक्षिणपथ के स्वामी, धन-वैभव सारे॥ ॐ जय...॥ विश्वकर्मा से निर्मित, अलकापुरी वासी। अष्ट सिद्धि नौ निधि, तुम ही धन-राशी॥ ॐ जय...॥ कुबेर देव की आरती, जो कोई नर गावे। कहत प्रेम प्रकाश स्वामी, सुख-संपत्ति पावे॥ ॐ जय...॥
॥ इति ॥
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